अंतर्दर्शन

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था

व्यक्ति को मैं नहीं जानता था,

हताशा को जानता था

इसलिये मैं उस व्यक्ति के पास गया

मैंने हाथ बढ़ाया

मेरा हाथ पकड़कर वो खड़ा हुआ

मुझको वो नहीं जानता था,

मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था

हम दोनों साथ चले

दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे,

साथ चलने को जानते थे.

विनोद कुमार शुक्ल

Published in: on September 21, 2008 at 6:26 pm  Comments (1)  
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