एक दिल और हज़ार ट्यूलिप्स

(कुछ और त्रिवेणियां. उम्मीद है सुधी पाठकों को शीर्षक समझ में आ गया होगा.)

कल रात कुछ गर्मी थी, मैं खिड़की खोल के सोया था,
सुबह हुई तो नाक के साथ बिस्तर भी गुलाबी था.
… खांसते- खांसते मुस्कुराना कोई आसान काम नहीं है.

हुंह! हमेशा की तरह फिर सो जाऊंगा पलटकर,
इस बार शायद कोई बेहतर सपना दीख पड़े.
… उफ़! ज़रा ये कम्बख़्त बलग़म थूक कर आता हूं.

ये पत्ते, ये रंग, ये ख़ुशबू- सब उस खिड़की से आये थे,
बंद ही कर देता हूं, अब ठंड भी कुछ बढ़ गयी है.
… देर कर दी तो शोर भी आने लगेगा बाहर का.

हिलते हुए ट्यूलिप्स को देख रहा हूं सुबह से,
और बुरी तरह खांस रहा हूं, दवा भी नहीं खायी कोई.
… शायद ट्यूलिप्स भी मुझे देख रहे हों हिलता हुआ.

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Published in: on May 6, 2008 at 2:25 am  Comments (5)  
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Happy Diwali!!!

एक अदद कम्बस्टेबल

पिछ्ली दीवालियों में घर पर ‘अंकुर’ तो था,

अबकी दीवाली ‘मैं’ घर पर मनाऊंगा,

…यहां आइंडहॊवन के अकेले, अंधेरे कमरे से।


ब्रेक-अप हुए अभी बहुत वक़्त नहीं गुज़रा था,

पर फिर से हम साथ ही जागते और सोते हैं,

…ख़ूबसूरत भी कितनी है कम्बख़्त तन्हाई ये।


रौशन कुछ करने की ख़्वाहिश मेरी भी थी,

ख़ाली बोतल लेकिन भभक-कर बुझ जाती है,

…अरे हां! याद आया- शरीर भी कम्बस्टेबल है!

[In Picture- Indian Barbie Doll]

Published in: on November 8, 2007 at 3:39 pm  Comments (2)  
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पीछे देख़ते हुए…

(इंजीनियरिंग कॉलेज के अंतिम दिनों के दौरान लिखी गयी यह ग़ज़ल एक कल्पित व्यक्ति की बानगी है, जो कॉलेज छोड़ने के बरसों बाद उसे याद करता है. मैनें गुलज़ार साहब की त्रिवेणी-शैली को दोहराने की कोशिश की है.)

आवाज़ें आती रहती हैं,
कानों में उंगली दो, या रुई के फाहे,
बीते बरसों की चीख़ें नहीं थमतीं.

पैसा है, लड़कियां हैं, असबाब है,
पर फ़ुरसत किसे है? और ज़हमत कहां है?
वो पहलवान की चाय नहीं है.

नाकारा थे, बड़बोले थे, बुरी लतों के मारे थे,
पर हंसते थे, और गाते थे, मिल बांट कर खाते थे,
अब तो फ़्रिज में भी चीज़ें सड़ जाया करती हैं.

आजकल ज़ुबान में दर्द बहुत होता है,
कोई इन्फ़ेक्शन हो गया है शायद,
या शायद कई दिनों से गालियां नहीं दीं.

पर ज़िंदगी का दस्तूर भी यही है,
आगे चलते जाना है, और नयी मंज़िलें पानी हैं,
अब इसे तो बंक नहीं कर सकते.

Published in: on October 23, 2007 at 6:36 am  Comments (2)  
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