चिहुंकना फिर फिर से…

चिहुंकना फिर फिर से,
और सिसकना सारी सारी रात फिर…
ज़रा सा खटका लगा नहीं कि ढह गया घरौंदा जैसे
कभी कभी ही होता है जब शाम नम नहीं होती.

मज़ा तो ये है कि मजाल है कोई आए!
गमक यही है, और शायद ये चिहुंक भी यही,
और जब कभी मज़ा नहीं तो उसकी आरज़ू ही सही!

चिहुंक- चिहुंक के तार तार हुआ जाता हूं,
सिसक- सिसक के भी बेज़ार हुआ जाता हूं,
कसक पुरानी है- चिहुंक से भी, सिसक से भी!
(हां, जिए हैं कई साल भी; हां, किया है थोड़ा कुछ भी)
(…………………………………………………..)
इन ब्रैकेटों के मुग़ालतों की दरकार हुआ जाता हूं!

Published in: on October 3, 2008 at 12:55 am  Comments (2)  
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अंतर्दर्शन

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था

व्यक्ति को मैं नहीं जानता था,

हताशा को जानता था

इसलिये मैं उस व्यक्ति के पास गया

मैंने हाथ बढ़ाया

मेरा हाथ पकड़कर वो खड़ा हुआ

मुझको वो नहीं जानता था,

मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था

हम दोनों साथ चले

दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे,

साथ चलने को जानते थे.

विनोद कुमार शुक्ल

Published in: on September 21, 2008 at 6:26 pm  Comments (1)  
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एक दिल और हज़ार ट्यूलिप्स

(कुछ और त्रिवेणियां. उम्मीद है सुधी पाठकों को शीर्षक समझ में आ गया होगा.)

कल रात कुछ गर्मी थी, मैं खिड़की खोल के सोया था,
सुबह हुई तो नाक के साथ बिस्तर भी गुलाबी था.
… खांसते- खांसते मुस्कुराना कोई आसान काम नहीं है.

हुंह! हमेशा की तरह फिर सो जाऊंगा पलटकर,
इस बार शायद कोई बेहतर सपना दीख पड़े.
… उफ़! ज़रा ये कम्बख़्त बलग़म थूक कर आता हूं.

ये पत्ते, ये रंग, ये ख़ुशबू- सब उस खिड़की से आये थे,
बंद ही कर देता हूं, अब ठंड भी कुछ बढ़ गयी है.
… देर कर दी तो शोर भी आने लगेगा बाहर का.

हिलते हुए ट्यूलिप्स को देख रहा हूं सुबह से,
और बुरी तरह खांस रहा हूं, दवा भी नहीं खायी कोई.
… शायद ट्यूलिप्स भी मुझे देख रहे हों हिलता हुआ.

Published in: on May 6, 2008 at 2:25 am  Comments (5)  
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यहीं कहीं…

Dedicated to Douglas Hofstadter, Marvin Minsky, Thomas Metzinger, Hugh Everett

[ये कविता हाइकूओं में लिखी गयी है- हाइकू कविता कहने का एक जापानी कायदा है. इसमें 3 पंक्तियां होती है, पंक्तियों में क्रमश: 5-7-5 अक्षर; अर्द्धाक्षरों को नहीं गिना जाता.]

मेरे साथ ही,
यहीं कहीं पास में,
मैं रहता हूं.

मुझसा कोई,
फड़फड़ा रहा है,
मेरी नसों में.

वो कहता है-
अतीत की आवाज़ें,
मेरी ही तो हैं!

मेरी अपनी,
नसों की गुफ़ाओं में,
मैं अटका हूं.

मेरे लिये भी,
मैं को ज़िंदा रखना,
मजबूरी है.

इन्ही नसों में,
इसी किसी समय,
हां, यहीं कहीं.

New Year

नया साल, इसमें नया क्या है?

क्या ही हो सकता है नया!

नया तो पल है,

और पलों की मसनद पर ये सपनीली दुनिया सजी है,

सपनीली दुनिया की मसनद

आंऽऽऽ

चलो धोकर आते हैं.

Published in: on December 31, 2007 at 6:42 am  Comments (4)  
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Happy Diwali!!!

एक अदद कम्बस्टेबल

पिछ्ली दीवालियों में घर पर ‘अंकुर’ तो था,

अबकी दीवाली ‘मैं’ घर पर मनाऊंगा,

…यहां आइंडहॊवन के अकेले, अंधेरे कमरे से।


ब्रेक-अप हुए अभी बहुत वक़्त नहीं गुज़रा था,

पर फिर से हम साथ ही जागते और सोते हैं,

…ख़ूबसूरत भी कितनी है कम्बख़्त तन्हाई ये।


रौशन कुछ करने की ख़्वाहिश मेरी भी थी,

ख़ाली बोतल लेकिन भभक-कर बुझ जाती है,

…अरे हां! याद आया- शरीर भी कम्बस्टेबल है!

[In Picture- Indian Barbie Doll]

Published in: on November 8, 2007 at 3:39 pm  Comments (2)  
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पीछे देख़ते हुए…

(इंजीनियरिंग कॉलेज के अंतिम दिनों के दौरान लिखी गयी यह ग़ज़ल एक कल्पित व्यक्ति की बानगी है, जो कॉलेज छोड़ने के बरसों बाद उसे याद करता है. मैनें गुलज़ार साहब की त्रिवेणी-शैली को दोहराने की कोशिश की है.)

आवाज़ें आती रहती हैं,
कानों में उंगली दो, या रुई के फाहे,
बीते बरसों की चीख़ें नहीं थमतीं.

पैसा है, लड़कियां हैं, असबाब है,
पर फ़ुरसत किसे है? और ज़हमत कहां है?
वो पहलवान की चाय नहीं है.

नाकारा थे, बड़बोले थे, बुरी लतों के मारे थे,
पर हंसते थे, और गाते थे, मिल बांट कर खाते थे,
अब तो फ़्रिज में भी चीज़ें सड़ जाया करती हैं.

आजकल ज़ुबान में दर्द बहुत होता है,
कोई इन्फ़ेक्शन हो गया है शायद,
या शायद कई दिनों से गालियां नहीं दीं.

पर ज़िंदगी का दस्तूर भी यही है,
आगे चलते जाना है, और नयी मंज़िलें पानी हैं,
अब इसे तो बंक नहीं कर सकते.

Published in: on October 23, 2007 at 6:36 am  Comments (2)  
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आशय

घर रहेंगे,

हमीं उनमें रह न पाएंगे

समय होगा,

हम अचानक बीत जाएंगे

अनर्गल ज़िंदगी ढोते

किसी दिन हम

एक आशय तक पहुंच-

सहसा बहुत थक जाएंगे.

-Kunwar Narayan.

Published in: on October 21, 2007 at 7:23 pm  Comments (5)  
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Kick Off !

I start this brand new blog by a short poem by Kedarnath Singh,

कल उगूंगा मैं,

आज तो कुछ भी नहीं हूं-

धूल, पत्ती, फूल, चिड़िया,

घास, फुनगी-

आह, कुछ भी तो नहीं!

(I had been writing posts on this blog for a while, but never cared to publish. However…)

Published in: on October 21, 2007 at 4:39 am  Leave a Comment  
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