Anurag Kashyap’s First

An accidental find, this film was made for Television in 1998. It is also one of Kay Kay’s firsts.

It is called Last Train to Mahakali.

[Nivedita Bhattacharya, the lady reporter in the movie, is actually Kay Kay’s wife.]

Wrong Reasons

One professor suddenly commented in the middle of the class-

“Your English can be said to be state of the art. We all must certainly look up to you.”

What could I have said except, “I just had a little practice back home.”

Well, that was not the first time people have praised me for all wrong reasons. Sigh.

 

… at least he got his second sentence right 😉

Published in: on May 29, 2008 at 6:34 pm  Comments (1)  
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Sureshot way to kiss a lady!

Before you think its another tip on how to hit on women, let me claim that it most assuredly is, although a foolproof one. All you’d need after reading this short post is, well, a lady. So, here we go…

Get a lady for whom you are a non- total stranger, and whose IQ is greater than 80 (and below 160). Catch her in a non gloomy/non- too busy mood. Start some conversation with her, orient it slowly to academics, or some geeky thing. And then, with the most casual look, tell her this-

“Well, would you do me a favor? I will make a small statement. All you have to do is if the statement is true, you give me your autograph, and if its false, you don’t give me your autograph.”

The lady now begins to think. All she’d need to do is give a damn autograph. Sounds easy. Interrupt her if she takes too much time.

“C’mon. I have not yet said anything, and you are already thinking.”

She will give a green signal.

“So let me remind. A true statement means an autograph and a false means no autograph. Deal?”

She nods.

“All right. So listen carefully. The statement I make is- ‘You will give me neither an autograph nor a kiss’. Thats it. Think and act now. And don’t you be a deal breaker.”

Now quickly step back a little and get out of her line of vision. Let her think.

One of the two things will happen within a minute, either she will smile back with a pleasant sensation on her face. Proceed to her then with literally your tongue in cheek- you are done. Or, she might look badly puzzled. Help her out, Einstein-

“Ma’am, suppose you think the statement is true. Then you’d have to give me your autograph. But then ‘you’ll give neither your autograph…’ thing can’t be true, right? Hence, the statement should be false. So, you will give me either your autograph or a kiss. But because the statement I made is false, I can’t take your autograph. That leaves only one option…”

Join her when she laughs. Happy ending 🙂

Well, I concede that she might just refuse to be sporty and refuse to go for the kiss. Invite her then for a Double-or-Nothing. On moral grounds she is bound to accept. Contact me for the next courageous hit 😉

This was a real life act successfully played by Raymond Smullyan. Whats more interesting is that the lady he kissed eventually became his wife!

Your logic can never fail you.

एक दिल और हज़ार ट्यूलिप्स

(कुछ और त्रिवेणियां. उम्मीद है सुधी पाठकों को शीर्षक समझ में आ गया होगा.)

कल रात कुछ गर्मी थी, मैं खिड़की खोल के सोया था,
सुबह हुई तो नाक के साथ बिस्तर भी गुलाबी था.
… खांसते- खांसते मुस्कुराना कोई आसान काम नहीं है.

हुंह! हमेशा की तरह फिर सो जाऊंगा पलटकर,
इस बार शायद कोई बेहतर सपना दीख पड़े.
… उफ़! ज़रा ये कम्बख़्त बलग़म थूक कर आता हूं.

ये पत्ते, ये रंग, ये ख़ुशबू- सब उस खिड़की से आये थे,
बंद ही कर देता हूं, अब ठंड भी कुछ बढ़ गयी है.
… देर कर दी तो शोर भी आने लगेगा बाहर का.

हिलते हुए ट्यूलिप्स को देख रहा हूं सुबह से,
और बुरी तरह खांस रहा हूं, दवा भी नहीं खायी कोई.
… शायद ट्यूलिप्स भी मुझे देख रहे हों हिलता हुआ.

Published in: on May 6, 2008 at 2:25 am  Comments (5)  
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यूं होता तो क्या होता?

बस 15 मिनट ही तो बचे थे. सो भी सकता था वो, पर फिर उसकी ‘कम्प्लीटनेस’ की सनक का क्या होता? अर्द्धजाग्रत अवस्था में ही वो उस थर्ड क्लास फ़िल्म को निपटाने लगा.

गोली की आवाज़ से उसकी आंखें कुछ ज़्यादा ही खुल गयी थीं. चंद सेकेंड वो नैपथ्य में निहारता रहा, फ़िर जैसे कुछ घबराकर स्क्रीन को देखने लगा. आख़िर उसकी तन्द्रा भंग हुई और उसे इस असीम ज्ञान का बोध हुआ कि अप्रत्याशित रूप से अंत में हीरो ही मारा जाता है!

कहानी यहीं पर ख़त्म हो गयी, और बेचारा लुढ़ककर सो गया. उठने के बाद वो अपने अर्द्धजागरण और शायद उस फ़िल्म को भी बिल्कुल भूल जाएगा…

…और साथ ही उस ख़ून को भी जो उसने अभी-अभी किया था- फ़िल्म के हीरो का! उसके जैसे स्वयंभू वर्ल्ड-सिनेमा प्रेमी को इंप्रेस करने के चक्कर में हमारे हीरो के पात्र को अपनी बलि देनी पड़ी. हीरो को शायद बचाया जा सकता था, अगर वो बस कुछ देर पहले झपक लेता.

(या अगर मुआ मुझ जैसे हाइपर-एक्टिव विज्ञान प्रेमी का दोस्त न होता!)

[Dedicated to the life and ideas of John Archibald Wheeler– one of the scientific giants of the penultimate times who died recently.]

Published in: on April 20, 2008 at 9:42 am  Comments (3)  
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Nonlinear

“How’ve you been man?”

“Prima, ‘nd you?”

“Yeah, fine.”
“Any mindfuck?”

“Heh, not here dude!”

“Ah, ok. Sorry.”
“So…”

“So, the winter is over.”

“Metaphor?”

“Ah, no. Not yet.”
“Or I dunno! Whatever.”

“It’s been quite some time now.”

“Well, I hope it’s timely!”

“Heh, ……….”

“……….”

“Ok, fuck it. You must know I was worried. How ‘d fuck have things been man?”

“Umm, nonlinear.”

Published in: on April 17, 2008 at 10:24 pm  Comments (5)  
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सरेराह

[Disclaimer– This story is purely (science) fictional, and the ideologies presented are not necessarily those the author adheres to.]

मुस्कुरा ही पड़ा था वो.

‘मुस्कुराना’ थोड़ा जेन्टलमैनली लगता है, वरना घिघियाती हुई मरियल सी हंसी ही कह लीजिये. इससे पहले कि आप कोई पारिभाषिक या वैयाकरणीय आपत्ति उठायें, मेरा पल्ला झाड़ डायलॉग सुनिये- लब्बोलुआब ये है कि चेहरे की कौन सी मांसपेशी किस एंगल पर खिंची ये तो नहीं बता सकता, पर वो कुछ ख़ुश ज़रूर हुआ था.

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पूरे शहर में शायद उसी अस्पताल में आज भी सीढ़ियां थीं. सरकारी था न. अच्छा है, मैंने सोचा, कल्चर नाम की चिड़िया की बीट और मेरी मैसोक़िस्टिक आरामगाह. यूं तो सीढ़ियां महज धरोहर ही थीं, और इनका इस्तेमाल करने का ख़्याल यहां के मरीज़ों को ही आ सकता था, पर किसे फ़ुरसत थी मेरे इस 176 सीढ़ियां चढ़ कर आठवें माले तक पहुंचने के कारनामे पर नज़र-ए-इनायत करने की.

“आख़िर ये डोज़ तय कैसे की जाती हैं?… मेरा मतलब मेरी दवाईयों से ही नहीं है. अलां बीमारी का इलाज फलां दवाई की अक्कड़ खुराक़ को बक्कड़ बजे लेने से होगा, ये कौन सा साइंस है? हमारी साली रियल नंबरों को कॉम्प्लेक्स नंबरों का सबस्पेस सिद्ध करने में लग जाती थी, और यहां ये डॉक्टर तो जैसे साइंस की टांगें उठाकर घुड़सवारी करते हैं.”

“तुमने फिर दवा नहीं खाई.”

“तुम पूछ रहे हो या बता रहे हो?”

ख़ैर अब पूछना क्या और बताना क्या? मैनें और कुछ भी बोला तो मेटाफ़िज़िक्स से लेकर होम्योपैथी तक के तर्कों की एक शृंखला प्रस्तुत हो जायेगी, रहेंगे ढाक में फिर भी तीन ही पात. अपनी खिसियाहट छुपाने के लिये मैंने मीमरीडर ऑन कर दिया. ऐडल्ट मोड में.

“तुम आख़िर चाहते क्या हो? क्यों ख़ामख़्वाह मुझे हंसाने की कोशिश करते हो? तुम जानते हो न कि मैं ऊब चुका हूं, पक चुका हूं मैं. परस्पर समभाव, प्रगतिशील समाज, प्रफुल्लित मानव- घिन आती है मुझे. तुम इसे उन्नति कहते हो, इस स्वतन्त्रता, स्वछ्न्दता, समानता के आलाप को? मेरा इंसान ऐसा नहीं है, वो वहशी है, दुस्साहसी है, सब कुछ है मगर हिजड़ा-“

“-बस करो, बस!” मैं कुछ गरमा सा गया. पिछ्ले कुछ समय से ये सब कुछ ज़्यादा ही बढ़ गया था. “तुम फ़िर जी ही क्यों रहे हो?”

वो अक्सर नहीं चौंकता, पर फ़िर मेरा गरमाना भी अक्सर नहीं होता. हालांकि वो चौंका भी था इतनी सफ़ाई से कि शायद कोई मनोवैज्ञानिक भी न पकड़ पाता. सेकेन्ड का 10वां हिस्सा समझ लीजिये.

और वो मुझे गौर से देखने लगा. मैं समझ गया, 20-25 मिनट तक अब उसकी आंखें मुझसे हटेंगी नहीं. शायद मेरे पिछले डायलॉग ने उसे टर्न ऑन कर दिया था. वक़्त हो चला था हमारे साप्ताहिक सहवास का.

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मैं उसे छोड़ क्यों नहीं देता? आख़िरी सीढ़ी उतरते वक़्त ये सवाल शायद 176वीं बार मेरे जेहन में कौंधा. हालांकि न तो मेरी बीवी को कोई शिक़ायत थी, न बच्चों को. कुछ लोगों को आपत्ति थी, मगर इसलिये क्योंकि वो दिमागी मरीज़ था, और हमारा सम्बन्ध उसके और मेरे भावनात्मक स्वास्थ्य के लिये घातक हो सकता था. अख़िरकार हम आदर्श युग के बाशिन्दे थे, वो युग जहां सामाजिक न्याय और सम्पन्नता की स्थापना हो चुकी थी. जहां सांइस और सांइटिफ़िक जैसे शब्द इंसान की सोच और काम में रच-बस गये थे. उसके जैसों को छोड़कर सभी ख़ुश थे, और सभी उससे भी कमोबेश ख़ुश ही थे- तभी तो उसे जेल में नहीं, अस्पताल में रखा हुआ था.

ख़ैर, वो सब कुछ छोड़ सकता था, मुझे नहीं. हम जब भी मिलते थे हिन्दी में बातें करते थे. मैं लखनऊ की सिम्बॉलिक लॉजिक प्रयोगशाला में काम करता था और फ़िर भी मुझे कभी-कभी गुस्सा आता था. मुझे अनएडेड सेक्स पसंद था. ये बातें बहुत सामान्य तो नहीं, असाधारण भी नही थीं, पर इन्हीं सब पर वो फ़िदा था, और मैं उसकी इस अदा पर.

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जानते हो, मैं हमेशा से इसी शहर में रहा हूं.”- वो बोला. मैं जानता था.

इधर कुछ दिनों से उसका कॉर्टिसॉल नियंत्रण में था, इसलिये बाहर आने की इजाज़त मिल गयी. शायद पिछ्ले कई सालों में हम दो पहले ऐसे मानव थे जो इस तरह सड़कों पर चहलकदमी कर रहे हों. टहलने के लिये पार्क थे, बाहर टहलने के लिये रोलर्स. गनीमत थी कि हम नवाबगंज में थे, शहर का बाहरी हिस्सा. ख़ैर, शायद उसका मूड कुछ सुधरे. डॉक्टरों की हिदायत थी कि वो हंसे- हार्मोनल इंजेक्शन बेअसर थे, दवाएं वो खाता नहीं था, और मेरी तीन साल की सारी कोशिशें नाकाम साबित हुई थीं.

वो अपनी छड़ी को सड़क और फ़ुटपाथ के बीच की पतली सी धूमिल रेखा में जितना हो सके गड़ा कर चल रहा था. मुझे कोफ़्त तो हो रही थी, पर उतनी नहीं जितनी उसके कमरे में होती.

“ये, ये क्या कर रहे हो.” मैनें देखा कि वो एक जगह अटक गया था.

“यहां कुछ है.” उसका संक्षिप्त सा जवाब था. हां, वहां शायद कुछ था. कोई धातु का टुकड़ा शायद, अंदर गड़ा हुआ, जिसका एक फ़लक ऊपर झांक रहा था. क्या वो इस क़दर सनकी हो गया कि किसी ख़ज़ाने की उम्मीद करने लगा?

वो बदस्तूर गाड़ता चला जा रहा था. उसको रोकना तो ख़ैर मेरे बूते से परे की चीज़ थी, मैं बस मना रहा था कि जो कुछ भी हो जल्दी बाहर निकले.

मैं पास के लैम्पपोस्ट से टिककर खड़ा हो गया. कोई छोटे से साइनबोर्ड जैसी चीज़ गड़ी थी शायद. हुंह! होगी. जल्दी ही मेरा ध्यान उसके चेहरे की ओर गया, वही उन्माद, पुरानी 2-डी फ़िल्मों के हीरो जैसा, और तभी…

यकीनन वो मुस्कुराया था. चाहे उतनी चौड़ी हंसी नहीं, पर एक आह्लाद ज़रूर था. और इस बार ये मेरा सपना नहीं था.

वो अभी भी नीचे उसी बोर्ड को देख रहा था. मुझे थोड़ी हैरत, थोड़ा रश्क़ सा हुआ. आख़िर मैं झुका, और देखा कि लिखा था-

‘मुस्कुराइए कि आप लखनऊ में हैं’

Published in: on March 8, 2008 at 5:02 am  Comments (9)  
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यहीं कहीं…

Dedicated to Douglas Hofstadter, Marvin Minsky, Thomas Metzinger, Hugh Everett

[ये कविता हाइकूओं में लिखी गयी है- हाइकू कविता कहने का एक जापानी कायदा है. इसमें 3 पंक्तियां होती है, पंक्तियों में क्रमश: 5-7-5 अक्षर; अर्द्धाक्षरों को नहीं गिना जाता.]

मेरे साथ ही,
यहीं कहीं पास में,
मैं रहता हूं.

मुझसा कोई,
फड़फड़ा रहा है,
मेरी नसों में.

वो कहता है-
अतीत की आवाज़ें,
मेरी ही तो हैं!

मेरी अपनी,
नसों की गुफ़ाओं में,
मैं अटका हूं.

मेरे लिये भी,
मैं को ज़िंदा रखना,
मजबूरी है.

इन्ही नसों में,
इसी किसी समय,
हां, यहीं कहीं.

New Year

नया साल, इसमें नया क्या है?

क्या ही हो सकता है नया!

नया तो पल है,

और पलों की मसनद पर ये सपनीली दुनिया सजी है,

सपनीली दुनिया की मसनद

आंऽऽऽ

चलो धोकर आते हैं.

Published in: on December 31, 2007 at 6:42 am  Comments (4)  
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BlasFamous

From Cectic, 5th December ’07-

cec1

cec2

Published in: on December 8, 2007 at 10:20 am  Comments (2)  
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Referentials

I am 16, Going on 17, दिल क्यों न धक-धक करे

  1. “Of course”
  2. “Yes. Yes”
  3. “Yes, but”
  4. “But, you see”
  5. “Umm”
  6. “Tell you what”
  7. “Listen”
  8. “Wait a minute”
  9. “Come on”
  10. “Why don’t you”
  11. “Hell what”
  12. “Cut it”
  13. “Will you please”
  14. “Enough”
  15. “What the hell”
  16. “SOAB”
  17. “Fuck off”
Published in: on November 25, 2007 at 8:16 am  Leave a Comment  
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The Sufferer

Some do.

I suffer.

Some see.

I suffer.

Some sleep.

I suffer.

I am the sufferer.

I miss the comfort of being sad.
-Kurt Cobain

I don’t look forward to.
-Me

Published in: on November 22, 2007 at 6:29 am  Leave a Comment  
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Happy Diwali!!!

एक अदद कम्बस्टेबल

पिछ्ली दीवालियों में घर पर ‘अंकुर’ तो था,

अबकी दीवाली ‘मैं’ घर पर मनाऊंगा,

…यहां आइंडहॊवन के अकेले, अंधेरे कमरे से।


ब्रेक-अप हुए अभी बहुत वक़्त नहीं गुज़रा था,

पर फिर से हम साथ ही जागते और सोते हैं,

…ख़ूबसूरत भी कितनी है कम्बख़्त तन्हाई ये।


रौशन कुछ करने की ख़्वाहिश मेरी भी थी,

ख़ाली बोतल लेकिन भभक-कर बुझ जाती है,

…अरे हां! याद आया- शरीर भी कम्बस्टेबल है!

[In Picture- Indian Barbie Doll]

Published in: on November 8, 2007 at 3:39 pm  Comments (2)  
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tv-links.co.uk

TV Links (tv-links.co.uk) was shut down on 18th October, just a couple of days after I had discovered this wonderful website. It was an extraordinary, no-nonsense streaming site, which had a database of practically all the popular movies/music/documentaries/anime etc.

I realized today that I was linking to the corpse of this dead website.

Published in: on October 23, 2007 at 11:11 pm  Comments (5)  
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पीछे देख़ते हुए…

(इंजीनियरिंग कॉलेज के अंतिम दिनों के दौरान लिखी गयी यह ग़ज़ल एक कल्पित व्यक्ति की बानगी है, जो कॉलेज छोड़ने के बरसों बाद उसे याद करता है. मैनें गुलज़ार साहब की त्रिवेणी-शैली को दोहराने की कोशिश की है.)

आवाज़ें आती रहती हैं,
कानों में उंगली दो, या रुई के फाहे,
बीते बरसों की चीख़ें नहीं थमतीं.

पैसा है, लड़कियां हैं, असबाब है,
पर फ़ुरसत किसे है? और ज़हमत कहां है?
वो पहलवान की चाय नहीं है.

नाकारा थे, बड़बोले थे, बुरी लतों के मारे थे,
पर हंसते थे, और गाते थे, मिल बांट कर खाते थे,
अब तो फ़्रिज में भी चीज़ें सड़ जाया करती हैं.

आजकल ज़ुबान में दर्द बहुत होता है,
कोई इन्फ़ेक्शन हो गया है शायद,
या शायद कई दिनों से गालियां नहीं दीं.

पर ज़िंदगी का दस्तूर भी यही है,
आगे चलते जाना है, और नयी मंज़िलें पानी हैं,
अब इसे तो बंक नहीं कर सकते.

Published in: on October 23, 2007 at 6:36 am  Comments (2)  
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