चिहुंकना फिर फिर से…

चिहुंकना फिर फिर से,
और सिसकना सारी सारी रात फिर…
ज़रा सा खटका लगा नहीं कि ढह गया घरौंदा जैसे
कभी कभी ही होता है जब शाम नम नहीं होती.

मज़ा तो ये है कि मजाल है कोई आए!
गमक यही है, और शायद ये चिहुंक भी यही,
और जब कभी मज़ा नहीं तो उसकी आरज़ू ही सही!

चिहुंक- चिहुंक के तार तार हुआ जाता हूं,
सिसक- सिसक के भी बेज़ार हुआ जाता हूं,
कसक पुरानी है- चिहुंक से भी, सिसक से भी!
(हां, जिए हैं कई साल भी; हां, किया है थोड़ा कुछ भी)
(…………………………………………………..)
इन ब्रैकेटों के मुग़ालतों की दरकार हुआ जाता हूं!

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Published in: on October 3, 2008 at 12:55 am  Comments (2)  
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Quick, who brought the Computer to India?

Sidheshwar Dug points out that it was Amitabh Bachchan’s Trishul where the word ‘Computer’ got mentioned in a Bollywood dialogue for the first time. That was way back in 1978.

Quoting from his post,

विदेश से पढ़कर लौटा युवा उद्यमी शेखर गुप्ता(शशि कपूर) अपने दफ्तर में काम करने वाली युवती गीता(राखी) को जब कई दफा ‘कंप्यूटर’ और ‘मिस कंप्यूटर’ कहकर संबोधित करता है, तो वह एक दिन कुछ खीझकर पछती है कि तुम मुझे बार-बार कंप्यूटर-कंप्यूटर क्यों कहते हो? उत्तर में नायक बड़े उत्साह से बताता है कि विदेशों में एक ऐसी मशीन आई है जो बेहद जल्दी और फुर्ती से बिना कोई गलती किये जोड़-घटाव-टाइपिंग जैसे काम चुटकियों में निपटा देती है, वह भी बिना थके.

See here.

Published in: on October 2, 2008 at 11:12 pm  Leave a Comment  
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अंतर्दर्शन

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था

व्यक्ति को मैं नहीं जानता था,

हताशा को जानता था

इसलिये मैं उस व्यक्ति के पास गया

मैंने हाथ बढ़ाया

मेरा हाथ पकड़कर वो खड़ा हुआ

मुझको वो नहीं जानता था,

मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था

हम दोनों साथ चले

दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे,

साथ चलने को जानते थे.

विनोद कुमार शुक्ल

Published in: on September 21, 2008 at 6:26 pm  Comments (1)  
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एक दिल और हज़ार ट्यूलिप्स

(कुछ और त्रिवेणियां. उम्मीद है सुधी पाठकों को शीर्षक समझ में आ गया होगा.)

कल रात कुछ गर्मी थी, मैं खिड़की खोल के सोया था,
सुबह हुई तो नाक के साथ बिस्तर भी गुलाबी था.
… खांसते- खांसते मुस्कुराना कोई आसान काम नहीं है.

हुंह! हमेशा की तरह फिर सो जाऊंगा पलटकर,
इस बार शायद कोई बेहतर सपना दीख पड़े.
… उफ़! ज़रा ये कम्बख़्त बलग़म थूक कर आता हूं.

ये पत्ते, ये रंग, ये ख़ुशबू- सब उस खिड़की से आये थे,
बंद ही कर देता हूं, अब ठंड भी कुछ बढ़ गयी है.
… देर कर दी तो शोर भी आने लगेगा बाहर का.

हिलते हुए ट्यूलिप्स को देख रहा हूं सुबह से,
और बुरी तरह खांस रहा हूं, दवा भी नहीं खायी कोई.
… शायद ट्यूलिप्स भी मुझे देख रहे हों हिलता हुआ.

Published in: on May 6, 2008 at 2:25 am  Comments (5)  
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यूं होता तो क्या होता?

बस 15 मिनट ही तो बचे थे. सो भी सकता था वो, पर फिर उसकी ‘कम्प्लीटनेस’ की सनक का क्या होता? अर्द्धजाग्रत अवस्था में ही वो उस थर्ड क्लास फ़िल्म को निपटाने लगा.

गोली की आवाज़ से उसकी आंखें कुछ ज़्यादा ही खुल गयी थीं. चंद सेकेंड वो नैपथ्य में निहारता रहा, फ़िर जैसे कुछ घबराकर स्क्रीन को देखने लगा. आख़िर उसकी तन्द्रा भंग हुई और उसे इस असीम ज्ञान का बोध हुआ कि अप्रत्याशित रूप से अंत में हीरो ही मारा जाता है!

कहानी यहीं पर ख़त्म हो गयी, और बेचारा लुढ़ककर सो गया. उठने के बाद वो अपने अर्द्धजागरण और शायद उस फ़िल्म को भी बिल्कुल भूल जाएगा…

…और साथ ही उस ख़ून को भी जो उसने अभी-अभी किया था- फ़िल्म के हीरो का! उसके जैसे स्वयंभू वर्ल्ड-सिनेमा प्रेमी को इंप्रेस करने के चक्कर में हमारे हीरो के पात्र को अपनी बलि देनी पड़ी. हीरो को शायद बचाया जा सकता था, अगर वो बस कुछ देर पहले झपक लेता.

(या अगर मुआ मुझ जैसे हाइपर-एक्टिव विज्ञान प्रेमी का दोस्त न होता!)

[Dedicated to the life and ideas of John Archibald Wheeler– one of the scientific giants of the penultimate times who died recently.]

Published in: on April 20, 2008 at 9:42 am  Comments (3)  
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सरेराह

[Disclaimer– This story is purely (science) fictional, and the ideologies presented are not necessarily those the author adheres to.]

मुस्कुरा ही पड़ा था वो.

‘मुस्कुराना’ थोड़ा जेन्टलमैनली लगता है, वरना घिघियाती हुई मरियल सी हंसी ही कह लीजिये. इससे पहले कि आप कोई पारिभाषिक या वैयाकरणीय आपत्ति उठायें, मेरा पल्ला झाड़ डायलॉग सुनिये- लब्बोलुआब ये है कि चेहरे की कौन सी मांसपेशी किस एंगल पर खिंची ये तो नहीं बता सकता, पर वो कुछ ख़ुश ज़रूर हुआ था.

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पूरे शहर में शायद उसी अस्पताल में आज भी सीढ़ियां थीं. सरकारी था न. अच्छा है, मैंने सोचा, कल्चर नाम की चिड़िया की बीट और मेरी मैसोक़िस्टिक आरामगाह. यूं तो सीढ़ियां महज धरोहर ही थीं, और इनका इस्तेमाल करने का ख़्याल यहां के मरीज़ों को ही आ सकता था, पर किसे फ़ुरसत थी मेरे इस 176 सीढ़ियां चढ़ कर आठवें माले तक पहुंचने के कारनामे पर नज़र-ए-इनायत करने की.

“आख़िर ये डोज़ तय कैसे की जाती हैं?… मेरा मतलब मेरी दवाईयों से ही नहीं है. अलां बीमारी का इलाज फलां दवाई की अक्कड़ खुराक़ को बक्कड़ बजे लेने से होगा, ये कौन सा साइंस है? हमारी साली रियल नंबरों को कॉम्प्लेक्स नंबरों का सबस्पेस सिद्ध करने में लग जाती थी, और यहां ये डॉक्टर तो जैसे साइंस की टांगें उठाकर घुड़सवारी करते हैं.”

“तुमने फिर दवा नहीं खाई.”

“तुम पूछ रहे हो या बता रहे हो?”

ख़ैर अब पूछना क्या और बताना क्या? मैनें और कुछ भी बोला तो मेटाफ़िज़िक्स से लेकर होम्योपैथी तक के तर्कों की एक शृंखला प्रस्तुत हो जायेगी, रहेंगे ढाक में फिर भी तीन ही पात. अपनी खिसियाहट छुपाने के लिये मैंने मीमरीडर ऑन कर दिया. ऐडल्ट मोड में.

“तुम आख़िर चाहते क्या हो? क्यों ख़ामख़्वाह मुझे हंसाने की कोशिश करते हो? तुम जानते हो न कि मैं ऊब चुका हूं, पक चुका हूं मैं. परस्पर समभाव, प्रगतिशील समाज, प्रफुल्लित मानव- घिन आती है मुझे. तुम इसे उन्नति कहते हो, इस स्वतन्त्रता, स्वछ्न्दता, समानता के आलाप को? मेरा इंसान ऐसा नहीं है, वो वहशी है, दुस्साहसी है, सब कुछ है मगर हिजड़ा-“

“-बस करो, बस!” मैं कुछ गरमा सा गया. पिछ्ले कुछ समय से ये सब कुछ ज़्यादा ही बढ़ गया था. “तुम फ़िर जी ही क्यों रहे हो?”

वो अक्सर नहीं चौंकता, पर फ़िर मेरा गरमाना भी अक्सर नहीं होता. हालांकि वो चौंका भी था इतनी सफ़ाई से कि शायद कोई मनोवैज्ञानिक भी न पकड़ पाता. सेकेन्ड का 10वां हिस्सा समझ लीजिये.

और वो मुझे गौर से देखने लगा. मैं समझ गया, 20-25 मिनट तक अब उसकी आंखें मुझसे हटेंगी नहीं. शायद मेरे पिछले डायलॉग ने उसे टर्न ऑन कर दिया था. वक़्त हो चला था हमारे साप्ताहिक सहवास का.

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मैं उसे छोड़ क्यों नहीं देता? आख़िरी सीढ़ी उतरते वक़्त ये सवाल शायद 176वीं बार मेरे जेहन में कौंधा. हालांकि न तो मेरी बीवी को कोई शिक़ायत थी, न बच्चों को. कुछ लोगों को आपत्ति थी, मगर इसलिये क्योंकि वो दिमागी मरीज़ था, और हमारा सम्बन्ध उसके और मेरे भावनात्मक स्वास्थ्य के लिये घातक हो सकता था. अख़िरकार हम आदर्श युग के बाशिन्दे थे, वो युग जहां सामाजिक न्याय और सम्पन्नता की स्थापना हो चुकी थी. जहां सांइस और सांइटिफ़िक जैसे शब्द इंसान की सोच और काम में रच-बस गये थे. उसके जैसों को छोड़कर सभी ख़ुश थे, और सभी उससे भी कमोबेश ख़ुश ही थे- तभी तो उसे जेल में नहीं, अस्पताल में रखा हुआ था.

ख़ैर, वो सब कुछ छोड़ सकता था, मुझे नहीं. हम जब भी मिलते थे हिन्दी में बातें करते थे. मैं लखनऊ की सिम्बॉलिक लॉजिक प्रयोगशाला में काम करता था और फ़िर भी मुझे कभी-कभी गुस्सा आता था. मुझे अनएडेड सेक्स पसंद था. ये बातें बहुत सामान्य तो नहीं, असाधारण भी नही थीं, पर इन्हीं सब पर वो फ़िदा था, और मैं उसकी इस अदा पर.

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जानते हो, मैं हमेशा से इसी शहर में रहा हूं.”- वो बोला. मैं जानता था.

इधर कुछ दिनों से उसका कॉर्टिसॉल नियंत्रण में था, इसलिये बाहर आने की इजाज़त मिल गयी. शायद पिछ्ले कई सालों में हम दो पहले ऐसे मानव थे जो इस तरह सड़कों पर चहलकदमी कर रहे हों. टहलने के लिये पार्क थे, बाहर टहलने के लिये रोलर्स. गनीमत थी कि हम नवाबगंज में थे, शहर का बाहरी हिस्सा. ख़ैर, शायद उसका मूड कुछ सुधरे. डॉक्टरों की हिदायत थी कि वो हंसे- हार्मोनल इंजेक्शन बेअसर थे, दवाएं वो खाता नहीं था, और मेरी तीन साल की सारी कोशिशें नाकाम साबित हुई थीं.

वो अपनी छड़ी को सड़क और फ़ुटपाथ के बीच की पतली सी धूमिल रेखा में जितना हो सके गड़ा कर चल रहा था. मुझे कोफ़्त तो हो रही थी, पर उतनी नहीं जितनी उसके कमरे में होती.

“ये, ये क्या कर रहे हो.” मैनें देखा कि वो एक जगह अटक गया था.

“यहां कुछ है.” उसका संक्षिप्त सा जवाब था. हां, वहां शायद कुछ था. कोई धातु का टुकड़ा शायद, अंदर गड़ा हुआ, जिसका एक फ़लक ऊपर झांक रहा था. क्या वो इस क़दर सनकी हो गया कि किसी ख़ज़ाने की उम्मीद करने लगा?

वो बदस्तूर गाड़ता चला जा रहा था. उसको रोकना तो ख़ैर मेरे बूते से परे की चीज़ थी, मैं बस मना रहा था कि जो कुछ भी हो जल्दी बाहर निकले.

मैं पास के लैम्पपोस्ट से टिककर खड़ा हो गया. कोई छोटे से साइनबोर्ड जैसी चीज़ गड़ी थी शायद. हुंह! होगी. जल्दी ही मेरा ध्यान उसके चेहरे की ओर गया, वही उन्माद, पुरानी 2-डी फ़िल्मों के हीरो जैसा, और तभी…

यकीनन वो मुस्कुराया था. चाहे उतनी चौड़ी हंसी नहीं, पर एक आह्लाद ज़रूर था. और इस बार ये मेरा सपना नहीं था.

वो अभी भी नीचे उसी बोर्ड को देख रहा था. मुझे थोड़ी हैरत, थोड़ा रश्क़ सा हुआ. आख़िर मैं झुका, और देखा कि लिखा था-

‘मुस्कुराइए कि आप लखनऊ में हैं’

Published in: on March 8, 2008 at 5:02 am  Comments (9)  
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यहीं कहीं…

Dedicated to Douglas Hofstadter, Marvin Minsky, Thomas Metzinger, Hugh Everett

[ये कविता हाइकूओं में लिखी गयी है- हाइकू कविता कहने का एक जापानी कायदा है. इसमें 3 पंक्तियां होती है, पंक्तियों में क्रमश: 5-7-5 अक्षर; अर्द्धाक्षरों को नहीं गिना जाता.]

मेरे साथ ही,
यहीं कहीं पास में,
मैं रहता हूं.

मुझसा कोई,
फड़फड़ा रहा है,
मेरी नसों में.

वो कहता है-
अतीत की आवाज़ें,
मेरी ही तो हैं!

मेरी अपनी,
नसों की गुफ़ाओं में,
मैं अटका हूं.

मेरे लिये भी,
मैं को ज़िंदा रखना,
मजबूरी है.

इन्ही नसों में,
इसी किसी समय,
हां, यहीं कहीं.

New Year

नया साल, इसमें नया क्या है?

क्या ही हो सकता है नया!

नया तो पल है,

और पलों की मसनद पर ये सपनीली दुनिया सजी है,

सपनीली दुनिया की मसनद

आंऽऽऽ

चलो धोकर आते हैं.

Published in: on December 31, 2007 at 6:42 am  Comments (4)  
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Happy Diwali!!!

एक अदद कम्बस्टेबल

पिछ्ली दीवालियों में घर पर ‘अंकुर’ तो था,

अबकी दीवाली ‘मैं’ घर पर मनाऊंगा,

…यहां आइंडहॊवन के अकेले, अंधेरे कमरे से।


ब्रेक-अप हुए अभी बहुत वक़्त नहीं गुज़रा था,

पर फिर से हम साथ ही जागते और सोते हैं,

…ख़ूबसूरत भी कितनी है कम्बख़्त तन्हाई ये।


रौशन कुछ करने की ख़्वाहिश मेरी भी थी,

ख़ाली बोतल लेकिन भभक-कर बुझ जाती है,

…अरे हां! याद आया- शरीर भी कम्बस्टेबल है!

[In Picture- Indian Barbie Doll]

Published in: on November 8, 2007 at 3:39 pm  Comments (2)  
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पीछे देख़ते हुए…

(इंजीनियरिंग कॉलेज के अंतिम दिनों के दौरान लिखी गयी यह ग़ज़ल एक कल्पित व्यक्ति की बानगी है, जो कॉलेज छोड़ने के बरसों बाद उसे याद करता है. मैनें गुलज़ार साहब की त्रिवेणी-शैली को दोहराने की कोशिश की है.)

आवाज़ें आती रहती हैं,
कानों में उंगली दो, या रुई के फाहे,
बीते बरसों की चीख़ें नहीं थमतीं.

पैसा है, लड़कियां हैं, असबाब है,
पर फ़ुरसत किसे है? और ज़हमत कहां है?
वो पहलवान की चाय नहीं है.

नाकारा थे, बड़बोले थे, बुरी लतों के मारे थे,
पर हंसते थे, और गाते थे, मिल बांट कर खाते थे,
अब तो फ़्रिज में भी चीज़ें सड़ जाया करती हैं.

आजकल ज़ुबान में दर्द बहुत होता है,
कोई इन्फ़ेक्शन हो गया है शायद,
या शायद कई दिनों से गालियां नहीं दीं.

पर ज़िंदगी का दस्तूर भी यही है,
आगे चलते जाना है, और नयी मंज़िलें पानी हैं,
अब इसे तो बंक नहीं कर सकते.

Published in: on October 23, 2007 at 6:36 am  Comments (2)  
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आशय

घर रहेंगे,

हमीं उनमें रह न पाएंगे

समय होगा,

हम अचानक बीत जाएंगे

अनर्गल ज़िंदगी ढोते

किसी दिन हम

एक आशय तक पहुंच-

सहसा बहुत थक जाएंगे.

-Kunwar Narayan.

Published in: on October 21, 2007 at 7:23 pm  Comments (5)  
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Hindi and Beyond

Hindi is the 5th most widely spoken language in its proper form by native speakers (खड़ी बोली dialect), 3rd most widely spoken in its general form by native speakers, and significantly understood by almost 950 million people.

Well, well, well, still I bet you can’t reach 50 and the list of current top literary figures in Hindi will begin to deteriorate. Hindi lacks literature.

But what is the problem? What if it lacks literature? Going by that, there are empirical predictions that till middle of this century, there will be none but 5-6 languages remaining in the world! But that seems sort of inevitable- aren’t we being the founders & carriers of the global world- the world where football is played and appreciated everywhere, the world where Oscars are the prizes about the best ‘international’ movies, and the world where we all say ‘fuck’ when there is something fucked up.

(I hate to be called anti-development, so I will be careful)

Remember Mir (publications)! Those who remember will feel a sudden rush of neurons in their head going a bit off-beat, yeah, for so many examples, illustrations, approach was not ‘western’ (did I say ‘American’). Ever heard of ‘Russians using the pencil in space when Americans spent millions on inventing an anti-gravity pen’. The pencil is nothing but that narrow region in your 1.5 kg brain where no education from B.Tech. in NITK to FRS/DSc/PhD from Harvard can take you.

Languages, Culture, Society, Sciences, Mathematics, Literature, Education, Politics, Philosophy, Psychology, Sociology, Law, Media, Arts, Cinema, Analysis, Intuition, Thinking, Brainstorming, Feelings, Creativity- all these are so human, merely human, and about human. And humanity is not governed by unitary method- It is NOT wise to dig 1 well for 10 hours, rather than digging 10 for an hour each. They are all different wells, and may lead to completely different waters.

So when you have such a massive language which lacks literature, you are basically diminishing the feelings, the ideologies, the touch that has become central in the development of that very language to its present form. And you can’t translate them as a fix. How do you replace that gap? There is no alternative of an Urdu or Hindustani Ghazal, or Sanskrit Shlok- translation just won’t work.

And so, in the mighty land called India, so many neurons were led to starvation leading to death, and the result was….

 

(I guess I just made a hypothesis about the causes of IT revolution in India)

Published in: on October 21, 2007 at 8:56 am  Comments (1)  
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Kick Off !

I start this brand new blog by a short poem by Kedarnath Singh,

कल उगूंगा मैं,

आज तो कुछ भी नहीं हूं-

धूल, पत्ती, फूल, चिड़िया,

घास, फुनगी-

आह, कुछ भी तो नहीं!

(I had been writing posts on this blog for a while, but never cared to publish. However…)

Published in: on October 21, 2007 at 4:39 am  Leave a Comment  
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