यूं होता तो क्या होता?

बस 15 मिनट ही तो बचे थे. सो भी सकता था वो, पर फिर उसकी ‘कम्प्लीटनेस’ की सनक का क्या होता? अर्द्धजाग्रत अवस्था में ही वो उस थर्ड क्लास फ़िल्म को निपटाने लगा.

गोली की आवाज़ से उसकी आंखें कुछ ज़्यादा ही खुल गयी थीं. चंद सेकेंड वो नैपथ्य में निहारता रहा, फ़िर जैसे कुछ घबराकर स्क्रीन को देखने लगा. आख़िर उसकी तन्द्रा भंग हुई और उसे इस असीम ज्ञान का बोध हुआ कि अप्रत्याशित रूप से अंत में हीरो ही मारा जाता है!

कहानी यहीं पर ख़त्म हो गयी, और बेचारा लुढ़ककर सो गया. उठने के बाद वो अपने अर्द्धजागरण और शायद उस फ़िल्म को भी बिल्कुल भूल जाएगा…

…और साथ ही उस ख़ून को भी जो उसने अभी-अभी किया था- फ़िल्म के हीरो का! उसके जैसे स्वयंभू वर्ल्ड-सिनेमा प्रेमी को इंप्रेस करने के चक्कर में हमारे हीरो के पात्र को अपनी बलि देनी पड़ी. हीरो को शायद बचाया जा सकता था, अगर वो बस कुछ देर पहले झपक लेता.

(या अगर मुआ मुझ जैसे हाइपर-एक्टिव विज्ञान प्रेमी का दोस्त न होता!)

[Dedicated to the life and ideas of John Archibald Wheeler– one of the scientific giants of the penultimate times who died recently.]

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Published in: on April 20, 2008 at 9:42 am  Comments (3)  
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3 CommentsLeave a comment

  1. good…the details of the climax are lost on me though.

  2. climax of the movie? that is irrelevant.
    see links in the dedication.

  3. no…I meant climax of the story.


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