सरेराह

[Disclaimer– This story is purely (science) fictional, and the ideologies presented are not necessarily those the author adheres to.]

मुस्कुरा ही पड़ा था वो.

‘मुस्कुराना’ थोड़ा जेन्टलमैनली लगता है, वरना घिघियाती हुई मरियल सी हंसी ही कह लीजिये. इससे पहले कि आप कोई पारिभाषिक या वैयाकरणीय आपत्ति उठायें, मेरा पल्ला झाड़ डायलॉग सुनिये- लब्बोलुआब ये है कि चेहरे की कौन सी मांसपेशी किस एंगल पर खिंची ये तो नहीं बता सकता, पर वो कुछ ख़ुश ज़रूर हुआ था.

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पूरे शहर में शायद उसी अस्पताल में आज भी सीढ़ियां थीं. सरकारी था न. अच्छा है, मैंने सोचा, कल्चर नाम की चिड़िया की बीट और मेरी मैसोक़िस्टिक आरामगाह. यूं तो सीढ़ियां महज धरोहर ही थीं, और इनका इस्तेमाल करने का ख़्याल यहां के मरीज़ों को ही आ सकता था, पर किसे फ़ुरसत थी मेरे इस 176 सीढ़ियां चढ़ कर आठवें माले तक पहुंचने के कारनामे पर नज़र-ए-इनायत करने की.

“आख़िर ये डोज़ तय कैसे की जाती हैं?… मेरा मतलब मेरी दवाईयों से ही नहीं है. अलां बीमारी का इलाज फलां दवाई की अक्कड़ खुराक़ को बक्कड़ बजे लेने से होगा, ये कौन सा साइंस है? हमारी साली रियल नंबरों को कॉम्प्लेक्स नंबरों का सबस्पेस सिद्ध करने में लग जाती थी, और यहां ये डॉक्टर तो जैसे साइंस की टांगें उठाकर घुड़सवारी करते हैं.”

“तुमने फिर दवा नहीं खाई.”

“तुम पूछ रहे हो या बता रहे हो?”

ख़ैर अब पूछना क्या और बताना क्या? मैनें और कुछ भी बोला तो मेटाफ़िज़िक्स से लेकर होम्योपैथी तक के तर्कों की एक शृंखला प्रस्तुत हो जायेगी, रहेंगे ढाक में फिर भी तीन ही पात. अपनी खिसियाहट छुपाने के लिये मैंने मीमरीडर ऑन कर दिया. ऐडल्ट मोड में.

“तुम आख़िर चाहते क्या हो? क्यों ख़ामख़्वाह मुझे हंसाने की कोशिश करते हो? तुम जानते हो न कि मैं ऊब चुका हूं, पक चुका हूं मैं. परस्पर समभाव, प्रगतिशील समाज, प्रफुल्लित मानव- घिन आती है मुझे. तुम इसे उन्नति कहते हो, इस स्वतन्त्रता, स्वछ्न्दता, समानता के आलाप को? मेरा इंसान ऐसा नहीं है, वो वहशी है, दुस्साहसी है, सब कुछ है मगर हिजड़ा-“

“-बस करो, बस!” मैं कुछ गरमा सा गया. पिछ्ले कुछ समय से ये सब कुछ ज़्यादा ही बढ़ गया था. “तुम फ़िर जी ही क्यों रहे हो?”

वो अक्सर नहीं चौंकता, पर फ़िर मेरा गरमाना भी अक्सर नहीं होता. हालांकि वो चौंका भी था इतनी सफ़ाई से कि शायद कोई मनोवैज्ञानिक भी न पकड़ पाता. सेकेन्ड का 10वां हिस्सा समझ लीजिये.

और वो मुझे गौर से देखने लगा. मैं समझ गया, 20-25 मिनट तक अब उसकी आंखें मुझसे हटेंगी नहीं. शायद मेरे पिछले डायलॉग ने उसे टर्न ऑन कर दिया था. वक़्त हो चला था हमारे साप्ताहिक सहवास का.

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मैं उसे छोड़ क्यों नहीं देता? आख़िरी सीढ़ी उतरते वक़्त ये सवाल शायद 176वीं बार मेरे जेहन में कौंधा. हालांकि न तो मेरी बीवी को कोई शिक़ायत थी, न बच्चों को. कुछ लोगों को आपत्ति थी, मगर इसलिये क्योंकि वो दिमागी मरीज़ था, और हमारा सम्बन्ध उसके और मेरे भावनात्मक स्वास्थ्य के लिये घातक हो सकता था. अख़िरकार हम आदर्श युग के बाशिन्दे थे, वो युग जहां सामाजिक न्याय और सम्पन्नता की स्थापना हो चुकी थी. जहां सांइस और सांइटिफ़िक जैसे शब्द इंसान की सोच और काम में रच-बस गये थे. उसके जैसों को छोड़कर सभी ख़ुश थे, और सभी उससे भी कमोबेश ख़ुश ही थे- तभी तो उसे जेल में नहीं, अस्पताल में रखा हुआ था.

ख़ैर, वो सब कुछ छोड़ सकता था, मुझे नहीं. हम जब भी मिलते थे हिन्दी में बातें करते थे. मैं लखनऊ की सिम्बॉलिक लॉजिक प्रयोगशाला में काम करता था और फ़िर भी मुझे कभी-कभी गुस्सा आता था. मुझे अनएडेड सेक्स पसंद था. ये बातें बहुत सामान्य तो नहीं, असाधारण भी नही थीं, पर इन्हीं सब पर वो फ़िदा था, और मैं उसकी इस अदा पर.

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जानते हो, मैं हमेशा से इसी शहर में रहा हूं.”- वो बोला. मैं जानता था.

इधर कुछ दिनों से उसका कॉर्टिसॉल नियंत्रण में था, इसलिये बाहर आने की इजाज़त मिल गयी. शायद पिछ्ले कई सालों में हम दो पहले ऐसे मानव थे जो इस तरह सड़कों पर चहलकदमी कर रहे हों. टहलने के लिये पार्क थे, बाहर टहलने के लिये रोलर्स. गनीमत थी कि हम नवाबगंज में थे, शहर का बाहरी हिस्सा. ख़ैर, शायद उसका मूड कुछ सुधरे. डॉक्टरों की हिदायत थी कि वो हंसे- हार्मोनल इंजेक्शन बेअसर थे, दवाएं वो खाता नहीं था, और मेरी तीन साल की सारी कोशिशें नाकाम साबित हुई थीं.

वो अपनी छड़ी को सड़क और फ़ुटपाथ के बीच की पतली सी धूमिल रेखा में जितना हो सके गड़ा कर चल रहा था. मुझे कोफ़्त तो हो रही थी, पर उतनी नहीं जितनी उसके कमरे में होती.

“ये, ये क्या कर रहे हो.” मैनें देखा कि वो एक जगह अटक गया था.

“यहां कुछ है.” उसका संक्षिप्त सा जवाब था. हां, वहां शायद कुछ था. कोई धातु का टुकड़ा शायद, अंदर गड़ा हुआ, जिसका एक फ़लक ऊपर झांक रहा था. क्या वो इस क़दर सनकी हो गया कि किसी ख़ज़ाने की उम्मीद करने लगा?

वो बदस्तूर गाड़ता चला जा रहा था. उसको रोकना तो ख़ैर मेरे बूते से परे की चीज़ थी, मैं बस मना रहा था कि जो कुछ भी हो जल्दी बाहर निकले.

मैं पास के लैम्पपोस्ट से टिककर खड़ा हो गया. कोई छोटे से साइनबोर्ड जैसी चीज़ गड़ी थी शायद. हुंह! होगी. जल्दी ही मेरा ध्यान उसके चेहरे की ओर गया, वही उन्माद, पुरानी 2-डी फ़िल्मों के हीरो जैसा, और तभी…

यकीनन वो मुस्कुराया था. चाहे उतनी चौड़ी हंसी नहीं, पर एक आह्लाद ज़रूर था. और इस बार ये मेरा सपना नहीं था.

वो अभी भी नीचे उसी बोर्ड को देख रहा था. मुझे थोड़ी हैरत, थोड़ा रश्क़ सा हुआ. आख़िर मैं झुका, और देखा कि लिखा था-

‘मुस्कुराइए कि आप लखनऊ में हैं’

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Published in: on March 8, 2008 at 5:02 am  Comments (9)  
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9 CommentsLeave a comment

  1. Good one Ankur!! Very well expressed…What we call it.. a ‘Rekhachitra’…right? anyway, it is capable enough, if not fully, to make me picturise the scenes, situation and there lies your success i guess!!

    Good work…Keep them rolling…Believe me, you picking up with time and you’ve really got it!!

    Cheers!

  2. naaiceeeeeeeee!!!

  3. @Saurabh- Thanks.

    @Nanga Fakir- Expecting more detailed review. Your turn anyways.

  4. suruwat me kahani ki lay pakadne me thoda samay lag gaya mujhe lekin dhire dhire samajh me aane laga | kuch sabd samajhne me dikkat hui | visheskar kahani ka ant mujhe bahut achhca laga | mujhe aapka kisi drisya ki vayangayatmak tarike se vyakhaya karne ka dhang behad pasand aaya | mujhe ek chij ki kammi mehsoos hui ki yahan kahani me kuch kami lag rahi thi jaise ki kisi bhi kirdaar ke bare me nahi bataya gaya hai | sayad jaisa aapne likha hai wo ek tarika hota ho kahani likhne ka, mujhe is baare me kuch bhi jankari nahi hai, ye bas kuch sabd hai meri taraf se | 🙂

  5. @Ravi- प्रतिक्रिया सुनकर अच्छा लगा, धन्यवाद. लघुकथा है, इसलिये सभी किरदारों का चरित्र उकेरना संभव नहीं था.

  6. mast hai

  7. How easily you, yes you Mr. Ankur Pandey controlling our state of mind…We may wanna reply but we may not as its human propensity not to correspond to a narcissist indulging in self praise..he he…Still i wanna say..Ideas are backstage concepts but considering world a stage and you a performer transmuting these ideas into actions to tell those sick audiences..those comman masses..about that birth…a natural phenomenon arousing from your METAPHYSICAL state of mind..let it be a free play of forces…yes your idea is not at all absurd…
    Bahut hi behatreen kaam pesh kiya hai aapne pandey saheb…desh ke sabse bade bhaag mein boli jane wali bhasha “hindi”…sabse jyada “angreji” bolne wali janta hum bhartiyon…aur lucknow ki shaan ham sabki bhasha “urdu” ka khoob sahi mishran hai…Full stops were great after the end of sentences…Beauty was that it made me think thrice before i can actually get it…Superb work bhai…Keep it up..!!!
    Just hope u r not enjoying the pain u took…to transmute this idea…

  8. @Shailesh- Whoa! thanks.

  9. Pandey Bhai, true, initially pain hua samajhne mein but baad mein kewl… nicely written, situation well explained. aur sach bataun toh is character mein jis mein tum tum ho usmein sirf tum he suit karoge, if i was visualising a movie from ur story toh tumhaara chehra saaf nazar aa raha tha…


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