पीछे देख़ते हुए…

(इंजीनियरिंग कॉलेज के अंतिम दिनों के दौरान लिखी गयी यह ग़ज़ल एक कल्पित व्यक्ति की बानगी है, जो कॉलेज छोड़ने के बरसों बाद उसे याद करता है. मैनें गुलज़ार साहब की त्रिवेणी-शैली को दोहराने की कोशिश की है.)

आवाज़ें आती रहती हैं,
कानों में उंगली दो, या रुई के फाहे,
बीते बरसों की चीख़ें नहीं थमतीं.

पैसा है, लड़कियां हैं, असबाब है,
पर फ़ुरसत किसे है? और ज़हमत कहां है?
वो पहलवान की चाय नहीं है.

नाकारा थे, बड़बोले थे, बुरी लतों के मारे थे,
पर हंसते थे, और गाते थे, मिल बांट कर खाते थे,
अब तो फ़्रिज में भी चीज़ें सड़ जाया करती हैं.

आजकल ज़ुबान में दर्द बहुत होता है,
कोई इन्फ़ेक्शन हो गया है शायद,
या शायद कई दिनों से गालियां नहीं दीं.

पर ज़िंदगी का दस्तूर भी यही है,
आगे चलते जाना है, और नयी मंज़िलें पानी हैं,
अब इसे तो बंक नहीं कर सकते.

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Published in: on October 23, 2007 at 6:36 am  Comments (2)  
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2 CommentsLeave a comment

  1. Loved these..all and especially the last one..well done.

  2. Thanks 🙂


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