चिहुंकना फिर फिर से,
और सिसकना सारी सारी रात फिर…
ज़रा सा खटका लगा नहीं कि ढह गया घरौंदा जैसे
कभी कभी ही होता है जब शाम नम नहीं होती.
मज़ा तो ये है कि मजाल है कोई आए!
गमक यही है, और शायद ये चिहुंक भी यही,
और जब कभी मज़ा नहीं तो उसकी आरज़ू ही सही!
चिहुंक- चिहुंक के तार तार हुआ जाता हूं,
सिसक- सिसक के भी बेज़ार हुआ जाता हूं,
कसक पुरानी है- चिहुंक से भी, सिसक से भी!
(हां, जिए हैं कई साल भी; हां, किया है थोड़ा कुछ भी)
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इन ब्रैकेटों के मुग़ालतों की दरकार हुआ जाता हूं!

